कोरोनावायरस परीक्षण प्रोटोकॉल में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी

| Last modified on अप्रैल 3rd, 2020 at 5:20 अपराह्न,

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पूरे विश्व में इस वक़्त कोरोनावायरस के प्रकोप की वजह से लोगों तक टेस्टिंग किट और सुविधा व्यवस्था नहीं पहुँच पा रही है। और ऊपर से लॉकडाउन होनें की वजह से तथा सनकी मीडिया द्वारा बार-बार इन बातों को उजागर करने से एक बात तो साफ़ है कि राष्ट्रों के चिकित्सा बुनियादी ढांचे पूरी तरह हिल चुके हैं। जिसके परिणामस्वरूप चारो ओर आतंक और अराजकता का माहौल है। स्वास्थ व्यवस्था के क्षेत्र में ऐसे दोषपूर्ण परिणामों की वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) वैश्विक आलोचना के घेरे में आ गया है। हालाँकि, ग्रेटगेमइंडिया की इन मामलों पर गहरी नज़र ने कोरोनावायरस परीक्षण प्रोटोकॉल में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी को उजागर किया है।

कोरोनावायरस परीक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि चीन और भारत में फाल्स पॉजिटिव के मामले 80% तक हैं। और इटली में यह मामले 99% तक वाकई चौंका देने वाले हैं।

कोरोनावायरस परीक्षण प्रोटोकॉल में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी
कोरोनावायरस परीक्षण प्रोटोकॉल में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी

परीक्षण प्रोटोकॉल

COVID-19 के प्रकोप ने दुनिया भर में चिकित्सा क्षमताओं को बढ़ाया है, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी सामिल है। इस तरह के संकटों से निपटने के लिए, WHO दुनिया भर में उपलब्ध सबसे विश्वसनीय, सटीक और अनुसंधान विधियों के आधार पर परीक्षण प्रोटोकॉल निर्धारित करता है।

जब भी कोई नया वायरस बाहर निकलता है, तो वायरस की पर्याप्त मात्रा का विश्लेषण करने के लिए एक डीएनए विस्तारण तकनीक की आवश्यकता होती है। यह डीएनए एक सिंगल स्ट्रैंड आरएनए जीनोम से प्राप्त होता है, रिवर्स-ट्रांसक्रिपटेस नामक एंजाइम का उपयोग करता है।

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इस प्रकार, 2019-nCoV का परीक्षण करने के लिए आज सबसे व्यापक रूप से अपनाई गई तकनीक आरटी-पीसीआर (रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन – पॉलीमारिस चेन रिएक्शन) परीक्षण है। जो वायरस के आनुवंशिक कोड की तलाश करते हैं और रोगी से गले की सूजन का सैंपल लिया जाता है। फिर प्रयोगशाला में वायरस का आनुवांशिक कोड (यदि यह वहां है) निकाला जाता है और बार-बार कॉपी किया जाता है। जिससे छोटी मात्रा विशाल और पता लगाने योग्य हो जाती है।

हालांकि, इस तकनीक और प्रोटोकॉल के निष्पादन के लिए एक आरएनए एक्सट्रैक्शन किट, एक पीसीआर मशीन और रीयजेन्ट्स और प्राइमर्स की आवश्यकता होती है। ये सभी किसी देश या क्षेत्र में उपलब्धता और पहुंच के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। यह फौल्टी प्रोटोकॉल के बाद बड़े पैमाने पर परीक्षण के साथ संयुक्त रूप से छोटा मुद्दा लगता है और सनकी मीडिया द्वारा प्रवर्धित करने से राष्ट्र के चिकित्सा बुनियादी ढांचे पर अधिक आतंक और अराजकता के परिणामस्वरूप कहर बरपा सकता है।

त्रुटिपूर्ण विज्ञान पर आधारित एक घटिया प्रथा

परीक्षण प्रोटोकॉल को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही है। यदि सैंपल सही ढंग से संग्रहीत और संभाले नहीं जाते हैं, तो परीक्षण काम नहीं कर सकता है। इस बारे में भी कुछ चर्चा हुई है कि क्या गले के पीछे का परीक्षण करके डॉक्टर गलती कर रहे हैं। जबकि यह नाक और गले के बजाय एक गहरा फेफड़ों का संक्रमण है।

परीक्षण त्रुटिपूर्ण विज्ञान  (flawed science) पर भी आधारित हो सकता है। यदि मरीज के वायरस में आनुवंशिक कोड वायरस के मिलान कोड से प्राइमर के साथ बांधने से पहले उत्परिवर्तित करता है, तो परीक्षण एक गलत नकारात्मक उत्पादन करेगा।

जर्नल रेडियोलॉजी में एक अध्ययन में दिखाया गया कि 167 में से पांच रोगियों को पहले नेगेटिव पाया गया और जब दोबारा परीक्षण किया गया तो वह पॉजिटिव पाए गए। फेफड़ों को स्कैन करने पर पता चला कि वह बीमार थे। सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों में काफी लोग ऐसे पाए गए जो पहले परीक्षण में नेगेटिव पाए जाने के बाद दोबारा पॉजिटिव पाए गए। ऐसे ही कुछ मामलों पर हमने अध्ययन किया है जिसका विश्लेषण आप नीचे पढ़ सकते हैं।

फिनलैंड

डब्ल्यूएचओ (WHO) के परीक्षण प्रोटोकॉल पर पिछले सप्ताह फिनलैंड के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण नें सवाल खड़े किये हैं। डब्ल्यूएचओ (WHO) ने देशों को कोरोनावायरस के लिए अधिक से अधिक रोगियों का परीक्षण करने के लिए कहा था।

फिनलैंड परीक्षण क्षमता बहुत ही कम होने के कारण केवल सबसे कमजोर समूहों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए कोरोनावायरस परीक्षणों को सीमित करना शुरूकर दिया। फिनलैंड के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण ने कहा कि हल्के लक्षणों वाले लोगों का परीक्षण स्वास्थ्य देखभाल संसाधनों की बर्बादी होगी।

फिनलैंड के स्वास्थ्य सुरक्षा प्रमुख, मिका सल्मिनन ने डब्ल्यूएचओ (WHO) की सलाह को खारिज करते हुए कहा कि डब्ल्यूएचओ (WHO) महामारी को नहीं समझता है। और उनके कोरोनावायरस परीक्षण प्रोटोकॉल अबतक पूरी तरह से विफल रहे हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका

डब्ल्यूएचओ (WHO) के दिशानिर्देशों के विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल गंभीर लक्षणों वाले रोगियों, कमजोर रोगियों और चिकित्सा कर्मचारियों को प्राथमिकता देने के लिए परीक्षण प्रोटोकॉल को संशोधित किया जाता है।

डब्ल्यूएचओ (WHO) से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में व्हाइट हाउस के कोरोनावायरस प्रतिक्रिया समन्वयक, डॉ. डेबोरा बीरक्स ने कहा, “यह परीक्षण करने में मदद नहीं करता है जहाँ 50% या 47% गलत रिजल्ट आये थे। कल्पना कीजिए कि अमेरिकी लोगों के लिए इसका क्या मतलब होगा, जब वे पॉजिटिव ही नहीं थे, तो किसी को बताने का क्या मतलब होगा।”

कंबोडिया

अमेरिकी सीडीसी ने पुष्टि की कि एक अमेरिकी महिला ने हॉलैंड अमेरिका लाइन के क्रूज जहाज वेस्टरडम में संभावित रूप से COVID-19 को फैलाने की आशंका जताई थी| और बाद में परीक्षण के बाद वह नेगेटिव पायी गयी

कंबोडिया में बुजुर्ग महिला का परीक्षण सकारात्मक था और जहाज को कई बंदरगाहों में प्रवेश से वंचित रखने के बाद देश में अनुमति दी गई थी।

आइसलैंड

आइसलैंड के स्वास्थ्य अधिकारियों और डीकोड जेनेटिक्स (deCode Genetics) ने COVID-19 वायरस के लिए व्यापक स्क्रीनिंग का काम किया। डीकोड जीनेटिक्स द्वारा परीक्षण शुक्रवार, 13 मार्च से शुरू हुआ और पहले 5,571 किए गए परीक्षणों के परिणाम में केवल 48 सैंपल पॉजिटिव मिले। देश के प्रमुख एपिडेमियोलॉजिस्ट गुडनसन के अनुसार COVID-19 के पॉजिटिव पाए जाने वाले लगभग आधे लोग नॉन- सिम्पटोमैंटिक हैं। अन्य आधे लोगों में केवल “बहुत मध्यम ठंड जैसे लक्षण दिख रहे थे।”

चीन

चीन में COVID-19 पॉजिटिव पाए जाने वाले लोगों में से, बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनमे शुरू में हलके लक्षण तो दिखाई देते हैं परन्तु जल्दी ही उनकी रिकवरी हो जाती है। “पिछले महीने, चीनी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के वैज्ञानिकों ने COVID-19 से ग्रसित पहले 72,314 लोगों के डेटा का विश्लेषण करते हुए एक शोध पत्र प्रकाशित किया। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि जो लोग इससे ग्रसित थे उनकी बीमारी कितनी गंभीर थी। अच्छी खबर यह थी की 80% से अधिक लोगों में केवल हलके लक्षण पाए गए। लगभग 14% लोगों की हालत गंभीर पायी गयी जबकि लगभग केवल 5% लोगो को क्रिटिकल कंडीशन में पाया गया।

इटली

इटली के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के एक अध्ययन के अनुसार, इटली में कोरोनावायरस के 99% से अधिक लोग ऐसे थे जो पहले से ही किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे थे।

इटली में कोरोनावायरस से संबंधित मौतें। ब्लूमबर्ग
इटली में कोरोनावायरस से संबंधित मौतें। ब्लूमबर्ग

रोम स्थित इस संस्थान ने देश के लगभग 18% कोरोनावायरस से हुई मृत्यु के मेडिकल रिकॉर्ड की जांच की, जिसमें पाया गया कि केवल तीन पीड़ितों या कुल में से केवल 0.8% लोगों को पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं थी। जिसका अर्थ यह है कि 99% लोग जो इटली में मारे गए वह पहले से किसी अन्य बीमारी से ग्रसित थे।

भारत

एक और उदाहरण जहां सांकेतिक रूप से फाल्स-पॉजिटिव संख्या है – वह भारत है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने कहा कि 80% कोरोनावायरस रोगियों को केवल हल्के सर्दी और बुखार की शिकायत है। बलराम भार्गव महानिदेशक, आईसीएमआर (ICMR) ने कहा कि इनमें से केवल 5% रोगियों को भर्ती करने और सपोर्टिव ट्रीटमेंट की आवश्यकता है।

महाराष्ट्र में पहले दो मामले जो पॉजिटिव पाए गए, दो सप्ताह बाद फिर से जब उनका टेस्ट किया गया तो वह COVID-19 नेगेटिव पाए गए और उन्हें छुट्टी दे दी गई। यह बेहद असामान्य है कि पहले दोनो मरीज पॉजिटिव पाए गए और फिर दोबारा टेस्ट करने पर इतनी जल्दी ही उनकी रिपोर्ट नेगेटिव पाई गयी। एएनआई (ANI) ने बताया कि नेगेटिव पाए जाने के बाद उनके टेस्ट दोबारा किए गए थे और वह दूसरी बार भी नेगेटिव पाए गए।

भारत के चिकित्सा अधिकारियों ने भी बड़े पैमाने पर परीक्षण करने का विरोध किया है। AIIMS के निदेशक (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) और ICMR (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि परीक्षण प्रोटोकॉल को भारत की परीक्षण क्षमता के अनुसार देखना होगा और भारत की स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही अपनी क्षमता पर काम कर रही है

नोबेल पुरस्कार विजेता माइकल लेविट का विश्लेषण

माइकल लेविट एक नोबेल पुरस्कार विजेता और स्टैनफोर्ड बायो-फिजिसिस्ट हैं। उन्होंने जनवरी में दुनिया भर में COVID -19 मामलों की संख्या का विश्लेषण करना शुरू किया और सही ढंग से गणना की कि चीन अपने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भविष्यवाणी से बहुत पहले ही कोरोना वायरस प्रकोप के चरम पर पहुँच जायेगा।

और अब उनका कहना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और दुनिया के बाकी हिस्सों में भी इसी तरह के परिणाम सामने आ सकते हैं।

जबकि कई महामारी विज्ञानियों ने बड़े पैमाने पर सामाजिक विघटन और लाखों लोगों की मृत्यु के महीनों, या वर्षों तक चेतावनी दी है। लेविट का कहना है कि डेटा विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर लागू नहीं होता है जहाँ उचित सोशल डिस्टेंसिंग के उपाय किए जाते हैं।

उन्होंने कहा, “हमें घबराहट को नियंत्रित करने की जरूरत है।” बड़े पैमाने पर हम ठीक होने जा रहे हैं।”

जब डब्ल्यूएचओ (WHO) ने एक नकली महामारी बनाई

तो, अगर WHO के परीक्षण प्रोटोकॉल वास्तव में दुनिया भर में उपलब्ध सबसे विश्वसनीय, सटीक, अच्छी टेक्नोलॉजी और अनुसंधान विधियों पर आधारित हैं, तो क्या उन्हें इसकी प्रत्यक्ष रूप से न दिखने वाली प्रभावशीलता और आतंक और अराजकता पैदा करने वाले इसके प्रभाव के बारे में नहीं पता है? वास्तव में डब्ल्यूएचओ (WHO) जानता है कि यह काम नहीं करता है और इसके अलावा यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की आलोचना की गई है।

2010 में, WHO को एक महामारी की झूठी खबर फैलाते पाया गया था और यह स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया था कि इसकी गंभीरता के बजाय वायरलिटी या बीमारी के प्रसार को मापने की इसकी कार्यप्रणाली गलत थी।

डब्ल्यूएचओ (WHO) के हेड इन्फ्लूएंजा विशेषज्ञ श्री फुकुदा ने स्वीकार किया कि महामारी घोषित करने के लिए U.N एजेंसी के छह-चरण प्रणाली ने H1N1 के बारे में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी, जो अंततः व्यापक रूप से एवियन इन्फ्लूएंजा के रूप में घातक नहीं थी।

वैक्सीन उद्योग की भूमिका

जैसा कि ग्रेटगेमइंडिया ने पहले बताया कि 2009 में, WHO को ‘तत्काल सूचना’ के बजाय भय और भ्रम फैलाने वाले H1N1 रोग के खतरे को बढ़ाते हुए पाया गया था। डब्ल्यूएचओ और राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय लेने की जांच के लिए जांच समितियों की नियुक्त की गई थी।

किस आधार पर, और किसकी सलाह पर महामारी घोषित की गई थी? किस आधार पर और किसकी सलाह पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने बहुराष्ट्रीय वैक्सीन निर्माताओं के साथ गुप्त अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे?

जब यह अंततः ज्ञात हो गया कि डब्ल्यूएचओ और राष्ट्रीय स्तर दोनों पर कई सबसे प्रभावशाली सलाहकारों को वैक्सीन उद्योग के लिए भुगतान किया गया था, तो कई टीकाकारों को भी याद किया गया। वे किसके हित में कामकर रहे थे? क्या यह हितों के टकराव का स्पष्ट मामला नहीं है?

डब्ल्यूएचओ को ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और सनोफी-एवेंटिस जैसी कंपनियों द्वारा H1N1 वैक्सीन के उत्पादन से लाभान्वित करने के बाद दवा उद्योग से जुड़ने के लिए आलोचना की गई थी।

कोरोनोवायरस से निपटने के लिए वैश्विक सरकार

ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री गॉर्डन ब्राउन ने विश्व के नेताओं से कोरोनावायरस से निपटने के लिए एक अस्थायी वैश्विक सरकार बनाने का आग्रह किया ताकि

(1) एक वैक्सीन का पता लगा सके।

(2) उत्पादन को व्यवस्थित कर सके, खरीद सके और मुनाफाखोरी को रोक सके।

हालांकि, वैश्विक सरकार के रूप में जैसा पुराना अनुभव WHO के साथ रहा है उससे शायद ही किसी विश्वास की गुंजाइश बचती है।

गॉर्डन ब्राउन बेशक, अब यह कहें की “इस बार, यह अलग है” पर सच यह है की इस बार वैश्विक सरकारों के रूप मौजूदा कोई उदहारण नहीं है। इसके बजाय, की अब वह G-20 से भी बड़ा एक समूह चाहता है!

यह भी हो सकता है कि वह 2008 की वित्तीय संकट के दौरान अपनी स्पष्ट सफलता पर निर्माण करना चाहेगा – ब्राउन ने अन्य वैश्विक नेताओं को बैंकों को जमानत देने की आवश्यकता के लिए राजी किया और फिर लंदन में G-20 की बैठक की मेजबानी की, जो $ 1.1 ट्रिलियन बचाव पैकेज के रूप में सामने आया।

इसलिए, हमें WHO पर भरोसा करने के लिए कहा जा रहा है, जिसने कम से कम पिछले दो महामारियों के माध्यम से बीमारी की व्यापकता और गंभीरता पर दुनिया को बुरी तरह से गुमराह किया है। तब वे वैक्सीन उत्पादकों के साथ वित्तीय संबंध में उलझ गए थे, और अब सेवानिवृत्त राजनेताओं का उपयोग करते हुए सामूहिक टीकाकरण के लिए फ़र्ज़ी टेस्टिंग प्रोटोकॉल के साथ हमें उल्लू बनाने आ रहे हैं।

धन्यवाद, लेकिन इसकी कोई ज़रूरत नहीं, श्रीमान गॉर्डन।

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